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Vallabhacharya Jayanti : जानें क्या है इस दिन का महत्व

नई दिल्ली: भारत के इतिहास में कई ऐसे विद्वान और संत हुए हैं जिन्होंने ईश्वर और उनकी भक्ति का एक अलग ही मार्ग खोजा। इन्हीं संतों में से एक थे महाप्रभु वल्लभाचार्य। इस महान संत ने भारत के ब्रज क्षेत्र में पुष्टि संप्रदाय की स्थापना की थी। इसी कारण महाप्रभु वल्लभाचार्य को भगवान कृष्ण का प्रबल अनुयायी कहा जाता था। इतना ही नहीं वल्लभाचार्य को भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। जानिए महाप्रभु वल्लभाचार्य के बारे में खास बातें।
महाप्रभु वल्लभाचार्य की जयंती

बता दें, हिंदू कैलेंडर के वैशाख महीने की कृष्ण पक्ष एकादशी के दिन वल्लभाचार्य का जन्म हुआ था। इसी कारण इसे जयंती के रूप में मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 26 अप्रैल को सुबह 1.39 बजे से शुरू होगी और 27 अप्रैल को दोपहर 12.47 बजे तक प्रभावी रहेगी
महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती का महत्व

श्री वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई. में वाराणसी में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इसी कारण हर साल वल्लभाचार्य जयंती 26 अप्रैल को मनाई जाती है। वल्लभाचार्य श्री कृष्ण के प्रबल अनुयायी थे। भगवान के कई भक्तों की तरह वह भी सर्वोच्च शक्ति में विश्वास करते थे और श्रीनाथ जी की पूजा करते थे, जिन्हें भगवान कृष्ण का एक रूप माना जाता है। एक लोकप्रिय धारणा के मद्देनजर मनाया जाता है कि इस शुभ दिन पर ही भगवान कृष्ण श्री वल्लभाचार्य के सामने प्रकट हुए थे।
ऐसा कहा जाता है कि जब वल्लभाचार्य उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने गोवर्धन पर्वत के पास एक असामान्य घटना देखी, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण से जुड़ी है। उन्होंने देखा कि एक गाय प्रतिदिन पहाड़ पर एक विशेष स्थान पर दूध दे रही थी। एक दिन, वल्लभाचार्य ने विशिष्ट स्थान खोदने के बारे में सोचा और खोदने में उन्हें भगवान कृष्ण की मूर्ति मिली। ऐसा कहा जाता है कि भगवान संत के सामने प्रकट हुए और उनके समर्पण के लिए उन्हें गले लगाया। उस दिन से पुष्टि संप्रदाय द्वारा भगवान कृष्ण की ‘बाला’ या युवा छवि की बहुत भक्ति के साथ पूजा की जाती थी

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