पिघली रिश्तों की बर्फ, संबंधो में खटास के बाद बैठक के मायने खास क्यों ?

पिघली रिश्तों की बर्फ, संबंधो में खटास के बाद बैठक के मायने खास क्यों ?

पिघली रिश्तों की बर्फ, संबंधो में खटास के बाद बैठक के मायने खास क्यों ?

नई दिल्ली : नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री को फोन के जरिये बधाई देकर बीते दिनों की तल्खी को कम करने की पहल की है। इसके साथ ही उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत द्वारा अस्थायी सदस्यता हासिल करने को भी उपलब्धि बताया। इसी क्रम में काठमांडू में नेपाली विदेश सचिव शंकर दास बैरागी और नेपाल स्थित भारतीय राजदूत विजय मोहन क्वात्रा के बीच सोमवार को बातचीत हुई।

यूं तो यह बातचीत ज्वाइंट ओवरसाइट मैकेनिज्म के क्रम में आयोजित की गई थी, लेकिन पिछले लंबे समय से दोनों देशों के रिश्तों में आई खटास के मद्देनजर इस बैठक के खास मायने हो जाते हैं। दरअसल, आठ मई को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा उत्तराखंड के धारचूला को लिपुलेख दर्रे से जोडऩे वाली अस्सी किलोमीटर लंबी रणनीतिक सड़क के उद्घाटन के बाद नेपाल पूरी तरह से बौखलाया हुआ था। उसने भारत पर उसकी भूमि का अतिक्रमण करने का आरोप लगाया था।

नया राजनीतिक नक्शा जारी कर बताया था नेपाल का हिस्सा

उसके बाद नेपाल ने भारत के लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपना इलाका बताते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसे जून में नेपाली संसद ने भी मंजूरी दे दी। भारत ने इसका विरोध करते हुए नेपाल के नक्शे को यह कहकर खारिज कर दिया था कि नक्शा ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। साथ ही दोनों देशों के बीच किसी भी विवाद को बातचीत के जरिये सुलझाने पर बल दिया था।

कहा जा रहा था कि ओली पार्टी में जारी भारी असंतोष से देश की जनता का ध्यान हटाने के लिये भारत विरोधी माहौल बना रहे थे, जिसके पीछे चीन की कूटनीतिक भूमिका बतायी जा रही थी। खासकर चीनी राजदूत की भूमिका पर नेपाल में भी सवाल उठे थे। उसके बाद ओली यहीं नहीं रुके, श्रीराम जन्मभूमि और महात्मा बुद्ध को लेकर भी खासे विवादित बयान दिये। लेकिन इसके बावजूद भारत ने इस उकसावे की बयानबाजी के बावजूद बड़े भाई की गरिमा व धैर्य को बनाये रखा, जिसके बाद यह बातचीत की संभावना बनी रही।

कूटनीतिक क्षेत्रों में यह सवाल उठाये जा रहे हैं कि नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के मिजाज में आये यूटर्न की वजह क्या है। कुछ लोग इसे चीन की रणनीति का हिस्सा बताते हैं तो कुछ लोग नेपाल की जनता का दबाव। जब से नेपाल के समाचार पत्रों में चीन द्वारा नेपाल की भूमि कब्जाये जाने की खबरें छपी हैं, ओली बचाव की मुद्रा में हैं। पार्टी स्तर पर भी उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें बीच-बचाव के लिये नेपाल स्थित चीनी राजदूत की भूमिका पर बार-बार सवाल उठते रहे हैं।

पकिस्तान के खिलाफ नेपाल में भी हुए आंदोलन

वहीं दूसरी ओर चीन द्वारा जमीन कब्जाने की खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकार की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद भी नेपाल में जनाक्रोश लगातार बढ़ रहा है। इतना ही नहीं, ओली सरकार की पाकिस्तान के साथ जुगलबंदी के खिलाफ भी नेपाल में आंदोलन हुए हैं, जिसमें पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ नेपाल में प्रदर्शन हुए। बहरहाल, नेपाली विदेश सचिव शंकर दास बैरागी और भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के बीच सोमवार को हुई बातचीत को नई शुरुआत माना जा रहा है। हालांकि, यह बातचीत कूटनीतिक स्तर की नहीं थी और इसका मकसद नेपाल में भारत द्वारा चलायी जा रही विकास योजना का मूल्यांकन और योजनाओं को गति देने पर केंद्रित था।

लंबी तल्खी के बाद एक अच्छा संकेत

इसके बावजूद इसे लंबी तल्खी के बाद अच्छा संकेत माना जा रहा था। वहीं दूसरी ओर  भारतीय प्रधानमंत्री से हुई बातचीत के बारे में ओली ने सफाई दी है कि इस बातचीत को किसी के अडऩे या झुकने के रूप में न देखा जाये। संबंधों में सुधार हो रहा है। ये प्रयास दोनों तरफ से हो रहे हैं। इसका एक निष्कर्ष यह भी है कि ओली को अहसास हो गया है कि अतीत में भारत नेपाल का बड़ा मददगार रहा है, जिसे नजरअंदाज करना नेपाल के लिए भी संभव नहीं है। भारत के उसके रोटी-बेटी के रिश्ते रहे हैं, जिसे नेपाल का कोई भी सत्ताधीश नकार नहीं सकता।

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