जन औषधि केंद्र: दस रुपये की दवा सौ रुपये में खरीद रहे मरीज

गोरखपुर:- प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों का बुरा हाल है। सरकार द्वारा नामित ठीकेदार के जिले में मात्र दो केंद्र हैं। एक जिला अस्पताल में दूसरा महिला अस्पताल में। दोनों पर एक साल से दवाएं नहीं आई हैं। सात बार दवाओं की मांग भेजी जा चुकी है। रोगी मेडिकल स्टोर से महंगे दाम पर दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। मरीज दस रुपये की दवा सौ रुपये में खरीदने को मजबूर हो रहे हैं। इतना ही नहीं इन केंद्रों पर काम करने वाले फार्मासिस्ट व कंप्यूटर आपरेटर का भी 15 माह से वेतन नहीं आया है।
गोरखपुर में 29 से अधिक हैं जन औषधि केंद्र

जिले में 29 से अधिक जनऔषधि केंद्र हैं। इसमें दो सरकारी और शेष निजी हैं। निजी केंद्रों पर पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हैं। लेकिन जिला अस्पताल व महिला अस्पताल के केंद्रों पर दवाएं नाममात्र की हैं। रोगी प्रतिदिन लौट रहे हैं। एक रोगी को यदि चार दवा चाहिए, उसे एक मिल रही है तो वह नहीं ले रहा है। इस वजह से दोनों केंद्रों पर एक साल में लगभग तीन-तीन लाख रुपये की दवाएं एक्सपायर हो गई हैं। इनमें ज्यादातर बच्चों व महिलाओं से संबंधित तथा एंटीबायोटिक दवाएं हैं
परवान नहीं चढ़ पाई योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जन औषधि योजना ‪एक जुलाई 2015 को शुरू की थी। मकसद था ब्रांडेड महंगी दवाओं के विकल्प में समान गुणवत्ता वाली जेनरिक दवाईयों को कम कीमत पर जनता को उपलब्ध कराना। इन केंद्रों पर मेडिकल स्टोरों की अपेक्षा 50 से 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर दवाएं मिलती हैं। लेकिन यह योजना सरकारी क्षेत्र में पूरी तरह फ्लाप रही। इसकी देखरेख की जिम्मेदारी भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग के फार्मास्युटिकल एंड मेडिकल डिवाइसेस ब्यूरो आफ इंडिया को दी गई है।
इस कंपनी को मिला केन्द्र चलाने का ठीका

इस संस्था ने उत्तर प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र खोलने के लिए प्रदेश सरकार से 2017 में करार किया। प्रदेश सरकार ने इसकी जिम्मेदारी स्टेट एजेंसी आफ कंप्रेहेंसिव हेल्थ इंश्योरेंस सर्विसेज को दे दी। इस संस्था ने पूरे प्रदेश को पांच भागों में बांटकर पांच ठीकेदारों को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में केंद्र खोलने का ठीका गुंजन इंटरप्राइजेज को मिला। लेकिन सभी अस्पतालों में केंद्र खुल नहीं पाए। गोरखपुर में मात्र दो केंद्र खुले हैं।

हमारा उत्तर प्रदेश सरकार से समझौता है। सरकारी केंद्रों के संचालन की जिम्मेदारी ठीकेदार की है। हम केवल दवाओं की आपूर्ति करते हैं। ठीकेदार दवाएं मंगाता ही नहीं है तो हम भेजेंगे कैसे? निजी केंद्र बहुत अच्छे तरीके से चल रहे हैं। वहां पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हैं। पूरे प्रदेश में 1200 से ज्यादा स्वास्थ्य केंद्र हैं। इनमें से पहले चरण में सरकार द्वारा एक हजार केंद्र खोले जाने थे। लेकिन अभी तक सरकारी अस्पतालों में केवल 140 केंद्र ही खुल पाए हैं।

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