34 साल बाद आ रही नई शिक्षा नीति में व्यापक बदलाव की प्रतीक्षा

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34 साल बाद आ रही नई शिक्षा नीति में व्यापक बदलाव की प्रतीक्षा

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लखनऊ : केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आखिरकार नई शिक्षा नीति को मंजूरी देकर शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की प्रक्रिया शुरु कर दी। अभी देश में 34 साल पहले बनी शिक्षा नीति लागू थी। इस बीच देश, दुनिया और समाज का पूरा ताना-बाना बदल गया, उद्योगों की संरचना बदल गई, जीवन व्यवहार बदल गया, सबकी जरूरतें बदल गईं। जाहिर है इन तमाम बदलावों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत थी।

नई नीति में जितने व्यापक स्तर पर बदलाव की घोषणा की गई है, उसे देखते हुए कम से कम एक बात विश्वासपूर्वक कही जा सकती है कि सरकार ने बदलावों को लेकर किसी भी तरह की हिचक नहीं दिखाई है। चाहे शिक्षा व्यवस्था का दायरा बढ़ाते हुए उसमें तीन साल के प्री-स्कूलिंग पीरियड को शामिल करने की बात हो, या कम से कम पांचवीं तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय अथवा क्षेत्रीय भाषा को बनाने की, ऐसे तमाम बड़े-बड़े फैसले इसमें शामिल हैं जिन पर समाज में तीखी बहस होती रही है।

मातृभाषा में शिक्षा को ही लिया जाए, तो ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि अंग्रेजी का ज्ञान 21वीं सदी के भारत की सबसे बड़ी ताकत रहा है। अपनी इसी क्षमता के बूते भारतीयों ने आईटी के क्षेत्र में दुनिया भर में अपने झंडे गाड़े, लेकिन विशेषज्ञ काफी पहले से कहते रहे हैं कि शुरुआती उम्र में मातृभाषा में पढ़ाई बच्चों के सहज व तेज मानसिक विकास में सहायक होती है। दूसरी बात यह कि अंग्रेजी मीडियम स्कूलों का जो क्रेज इस बीच बना है, उसने बच्चों के बीच खाई चौड़ी कर समाज को कई स्तरों पर नुकसान पहुंचाया है।

मल्टिपल एग्जिट की होगी व्यवस्था

मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई का प्रचलन इस खाई को थोड़ा-बहुत भी पाटता है तो सबके लिए अच्छा होगा। इसी तरह कॉलेज स्तर पर भी अंडरग्रैजुएट कोर्स को तीन या चार साल का और एमए को एक साल का करने से लेकर मल्टिपल एग्जिट की व्यवस्था करने तक ऐसे अनेक कदम उठाए गए हैं जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए बाकी दुनिया से तालमेल बनाते हुए चलना आसान बनाएंगे। हां, इसमें कुछ ऐसी घोषणाएं भी कर दी गई हैं जो पहली नजर में रस्मी लगती हैं और जिनके अमल में आने को लेकर संदेह स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए इसमें शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसदी खर्च करने की बात है जो आजादी के बाद से ही दोहराई जाती रही है।

इस सपने को उच्च शिक्षा में प्राइवेट सेक्टर के सहयोग से ही पूरा किया जा सकता है। लिहाजा सरकार को इस नीति में उन मांगों को जोडऩा चाहिए जो उच्च शिक्षा संस्थान काफी समय से कर रहे हैं। बहरहाल, व्यापक बदलाव की उम्मीद जगाती नई शिक्षा नीति अमल की कसौटियों पर कितना खरा उतरती है, यह देखने के लिए थोड़ा इंतजार तो करना ही होगा।


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