Independence Day 2021: जानें तिरंगे का इतिहास और उसके नियम

देश इस बार 75वां स्वतंत्रता दिवस (Independence Day 2021) मनाएगा। आजादी के इस माह में आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास के बार में। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया।

तिरंगा हमारे लिए गौरव का विषय है। इस नाम के पीछे की वजह इसमें इस्तेमाल होने वाले तीन रंग हैं, केसरिया, सफेद और हरा। इसके मौजूदा स्वरूप का विकास भी कई पड़ावों में हुआ है। अभी जो तिरंगा फहराया जाता है उसे 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था। तिरंगे को आंध्रप्रदेश के पिंगली वैंकैया ने बनाया था। वहीं क्या आप जानते हैं कि तिरंगे को फहराने के कुछ नियम भी हैं।

आपको बता दें कि किसी मंच पर तिरंगा फहराते समय जब बोलने वाले का मुंह श्रोताओं की तरफ हो तब तिरंगा हमेशा उसके दाहिने तरफ होना चाहिए। बताया ऐसा भी जाता है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज में जब चरखे की जगह अशोक चक्र लिया गया तो महात्मा गांधी नाराज हो गए थे। रांची का पहाड़ी मंदिर भारत का अकेला ऐसा मंदिर हैं जहां तिरंगा फहराया जाता हैं। 493 मीटर की ऊंचाई पर देश का सबसे ऊंचा झंडा भी रांची में ही फहराया गया है।

राष्‍ट्रीय ध्‍वज को लेकर कानून

भारत में राष्‍ट्रीय ध्‍वज को लेकर कानून भी बनाया गया है। जिसमें तिरंगे को फहराने के नियम निर्धारित किए गए हैं। वहीं जो इन नियमों का उल्लंघन करते हैं उन्हें जेल भी हो सकती है। तिरंगा हमेशा कॉटन, सिल्क या फिर खादी का ही होना चाहिए। प्लास्टिक का झंडा बनाने की मनाही है। तिरंगे का निर्माण हमेशा रेक्टेंगल शेप में ही होगा, जिसका अनुपात 3:2 तय है। वहीं जबकि अशोक चक्र का कोई माप तय नही हैं सिर्फ इसमें 24 तिल्लियां होनी आवश्यक हैं।

बता दें कि भारत में सबसे पहले लाल, पीले व हरे रंग की हॉरिजॉन्टल पट्टियों पर बने झंडे को 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क), कोलकाता में फहराया गया था। झंडे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है। किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा नहीं लगाया जा सकता और न ही इसका प्रयोग किसी बिल्डिंग को ढकने किया जा सकता है।

तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए

नियम में यह भी बताया गया है कि तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए। तिरंगे को किसी भी प्रकार के यूनिफॉर्म या सजावट में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। इसी के साथ ही किसी भी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगा सकते और न ही बराबर रख सकते हैं। बता दें कि भारत में बेंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान हैं जो झंडा बनाने का और सप्लाई करने का काम करता है।

वहीं, देश के लिए जान देने वाले शहीदों और देश की महान शख्सियतों को तिरंगे में लपेटा जाता है। इस दौरान केसरिया पट्टी सिर की तरफ और हरी पट्टी पैरों की तरफ होनी चाहिए। शव को जलाने या दफनाने के बाद उसे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती हैं। इसके अलावा कटे-फटे या रंग उड़े हुए तिरंगे को भी सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है।

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