7 साल बाद इंसाफ, लेकिन अब भी संशय बरकरार

शैलेंद्र सिंह

आखिरकार 7 साल 22 दिन बाद पूरे देश को दहला देने वाले ‘निर्भया’ मामले में दिल्‍ली की एक अदालत ने चारों दंरिदों को फांसी देने की तारीख तय कर दी। इस फैसले के साथ ही इंसाफ की एक धुंधली किरण दिखाई दे रही है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि इस जघन्‍य अपराध को अंजाम देने वाले दोषियों के पास नि:संदेह अब भी कानूनी विकल्‍प मौजूद हैं। जाहिर है वह इनका इस्‍तेमाल जरूर करेंगे, लेकिन दिल्‍ली की अदालत के फांसी की तारीख तय करने वाले फैसले ने देश में एक ऐसा संदेश दिया है जिससे लोगों का कानून व्‍यवस्‍था पर विश्‍वास बढ़ेगा।

अदालत के फैसले को सुनकर लंबे अरसे से इंसाफ का इंतजार कर रहे निर्भया के माता-पिता के चेहरे पर एक ऐसी खुशी की झलक देखने को मिली मानो उनके लिए कोई त्‍योहार हो। ऐसा हो भी क्‍यों ना, साल 2012 की उस काली रात ने इस परिवार की खुशियों पर ऐसा ग्रहण लगाया, जिससे वो आजतक उभरने की कोशिश कर रहे हैं। फैसले को सुनकर निर्भया के माता-पिता की आंखों से झलक रहे आंसू उनकी खुशी का बयां कर रहे थे, जिसका इंतजार उन्‍हें ही नहीं बल्कि पूरे देश को था।

इतने लंबे इंतजार के बाद अब फैसला आना केवल हास्यास्पद ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है क्‍योंकि 2012 के जिस मामले ने देश को हिला कर रख दिया था उसके दोषियों की सजा पर अमल अब तक नहीं हो सका और वह भी तब जब देश की शीर्ष अदालत ने अपना फैसला साल 2017 में ही सुना दिया था। इसके बाद जो कुछ हुआ वह न्याय प्रक्रिया की कच्छप गति को ही दर्शाता रहा। न्याय प्रक्रिया की इस सुस्त रफ्तार से न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अनजान नहीं लेकिन दुर्भाग्य से उन परिस्थितियों का निराकरण होता नहीं दिखता जिनके चलते समय पर न्याय पाना कठिन है।

यही नहीं, लगता है किसी को इस बात पर भी लज्जा नहीं आई कि निर्भया के माता-पिता को न्याय के लिए किस तरह दर-दर भटकना पड़ रहा? दुर्भाग्य से यह एकलौता ऐसा मामला नहीं जिसमें न्याय पाना बड़ी समस्या बना हो, बल्कि यह तो गनीमत है कि इस मामले में सात साल बाद न्याय होता दिख रहा है। अधिकांश मामलों में तो दशकों बाद भी अंतिम स्तर पर न्याय नहीं हो पाता, जिनमें तमाम मामले संगीन किस्म के ही होते हैं। ऐसी जटिल कानूनी प्रक्रिया के कारण केवल न्याय व्यवस्था का उपहास ही नहीं उड़ता, बल्कि अपराधी तत्वों के मंसूबों को भी बल मिलता है।

यह हमारी विडंबना ही है कि सभी इससे अवगत हैं कि न्याय की शिथिल गति एक प्रबल समस्‍या है, फिर भी वैसे प्रयास नहीं हो रहे हैं जिससे न्याय में देरी न होने पाए। हमारे लिए ज्‍यादा बेहतर यह होता कि हमारे नीति-नियंता कानून के शासन को लेकर घिसे-पिटे उपदेश देने के बजाय यह देखें कि न्याय की कच्‍छप गति भारतीय लोकतंत्र को दुर्गति की ओर ले जा रही है। यही नहीं, बल्कि समाज को भी यह समझना होगा कि दुष्कर्मी तत्वों को केवल कठोर सजा से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इन सरीखे अपराध कहीं न कहीं यह भी दर्शाते हैं कि समाज बेहतर नागरिकों का निर्माण करने के अपने दायित्व का निर्वाह सही ढंग से नहीं कर पा रहा है।