चीन ने बनाया राजनयिक संबंध, 180 देश बने दोस्त

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक चीन लगातार सुपर पॉवर के रुतबे को बढ़ा रहा है. इसी कड़ी में चीन के साथ राजनयिक संबंध रखने वाले देशों की संख्या 180 तक जा पहुंची है.चाइना रेडियो इंटरनेशनल के हवाले से आईएनएस ने एक रिपोर्ट में बताया कि साल 1949 से 2019 के बीच 70 वर्षों में चीन ने विश्व के 90 प्रतिशत से अधिक देशों के साथ राजनयिक संबंधों की स्थापना की है.

एक चीन सिद्धांत सर्वमान्य: 

इतना ही नहीं पिछले 40 से अधिक वर्षो में एक चीन सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सर्वमान्य बन गया है. अब तक विश्व के 195 राष्ट्रों में से 180 देशों ने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किया है.

हाल ही में चीन और सोलोमन द्वीप समूह के बीच 21 सितंबर 2019 को औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध स्थापित हुआ था. इसके 18 दिन के बाद सोलोमन द्वीप समूह के प्रधानमंत्री सोगावारे ने प्रतिनधिमंडल के साथ चीन की यात्रा की.

किरीबाती ने भी बढ़ाया हाथ: 

सोलोमन द्वीप समूह के बाद प्रशांत महासागर के द्वीप देश किरीबाती ने इस सितंबर को चीन के साथ 16 साल तक स्थगित हुए राजनयिक संबंधों की बहाली की है.  किरीबाती के राष्ट्रपति ने बताया कि देश के विकास के लिए किरीबाती को चीन जैसा दोस्त चाहिए.इसके अलावा 21 अगस्त 2018 को चीन और एल साल्वाडोर ने राजनयिक संबंध की स्थापना की. हालांकि इसके बाद साल्वाडोर में राजनीतिक अस्थिरता आई. चीन-साल्वाडोर संबंध में अनिश्चितता नजर आई.

इस जून में नायिब बुकेले साल्वाडोर के राष्ट्रपति बने. दिसंबर में बुकेले ने चीन की पहली यात्रा की, उनके साथ हुई वार्ता में शी चिनफिंग ने राष्ट्रपति बुकेले के चीन साल्वाडोर संबंध विकसित करने के सही फैसले की प्रशंसा की.इस यात्रा के दौरान बुकेले ने विश्वास जताया कि चीन जैसे महान और ईमानदार देश के साथ संबंधों का विकास करना साल्वाडोर के लिए विकास का अवसर लाएगा और जनता को ठोस लाभ पहुंचाएगा.

40 साल में कैसे बन गया सुपरपावर?

करीब 40 साल पहले जब आज के ताकतवर और आर्थिक महाशक्ति चीन की नींव रखी जा रही थी तो अमेरिका व दुनिया के तमाम देश इससे बिल्कुल अनजान थे. 13 दिसंबर, 1978 को कम्युनिस्ट पार्टी की एक ऐतिहासिक बैठक में चीन के नेता डेंग श्यापेंग देश का कायापलट करने वाली नीतियों की आधारशिला रख रहे थे.

डेंग ने चीन की बंद और नियंत्रित अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोलने का फैसला किया. उसके बाद आर्थिक तौर पर दुनिया से कटे चीन के वर्ल्ड फैक्ट्री बनने का सफर शुरू हो गया. जब डेंग ने 1978 में आर्थिक सुधार लॉन्च किए तो चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिकी की तुलना में केवल 5 फीसदी थी और उस वक्त चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी जाम्बिया के बराबर थी.

दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार रहा चीन अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. शायद ये कल्पना करना भी मुश्किल है कि 40 साल पहले चीन की 88 फीसदी आबादी 2 अमेरिकी डॉलर से भी कम में गुजर-बसर करने को मजबूर थी.वर्तमान में चीन के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार (3.12 ट्रिलियन डॉलर) है, दूसरी सबसे बड़ी जीडीपी (11 ट्रिलियन डॉलर) है और उसके पास तीसरा सबसे ज्यादा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (170 अरब डॉलर) आता है.

1980 में चीन की अर्थव्यवस्था का ज्यादातर हिस्सा कृषि आधारित था जबकि अब चीन की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का 10 फीसदी से भी कम योगदान है. ये सारे आंकड़े चीन की आर्थिक सफलता की कहानी अपने आप बयां करते हैं.चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बाजार के भरोसे छोड़ने के बजाय घरेलू अर्थव्यवस्था में भी लगातार सुधार किए. आर्थिक सुधारों के तहत खराब प्रदर्शन कर रहीं सरकारी इंटरप्राइजेज को या तो बंद कर दिया गया या फिर उन्हें पुर्नगठित किया गया.हाइटेक इंडस्ट्रीज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जेनेटिक इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स, स्पेस और एविएशन समेत तमाम क्षेत्रों में चीन दुनिया के तमाम देशों को टक्कर दे रहा है.